ससुराल से पीहर की आधी दुरी
तय करने के बाद
माँ बदल जाती थी
और मै देखता
बदलाव के उन रंगों को
बैठ कर गोद में
रसोई के आखिरी कौर से
तृप्त हो जाने वाली माँ
जिद करती थी ट्रेन में
खोमचे वाले से
एक्स्ट्रा मिर्च की मुंग की
और मै देखता था पहली दफे
किसी को खुद केलिए जीते हुए
उम्र का ऋणात्मक त्वरण
भौतिकी की सीमाओं को झुटला
बना देता था फिर से
माँ को उनके बाबुजी की बेटी
एक सजग शालीन वधुको
अल्हड़ , चंचल बालिका
अब समझा क्यूँ होता है
मायका प्रिय हर माँको
बस एक पहचानकेलिए
यही तो पहचाना जाता है
एक पुरूष
अपनी पत्नी के नाम से
एक पुत्र
अपनी माँ के नाम से
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nice poetry
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